फिर आ गई भोपाल गैस कांड की बरसी, 36 साल बाद भी पीड़ितों को न्याय की आस

News Aroma Media
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भोपाल: भोपाल गैस कांड की बरसी फिर आ गई। बुधवार, 03 दिसम्बर को दुनिया की इस सबसे भीषणतम औद्योगिक त्रासदी को 36 वर्ष पूरे हो रहे हैं, लेकिन गैस पीडि़त अब भी उचित इलाज, पर्याप्त मुआवजे, न्याय एवं पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की लड़ाई लड़ रहे हैं।

मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और उन्हें अब भी न्याय की उम्मीद है।

गौरतलब है कि वर्ष 1984 में 2 और 3 दिसम्बर की दरमियानी रात भोपाल स्थित अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड के प्लांट (अब डाउ केमिकल) से जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट (मिक) गैस का रिसाव हुआ था, जिसने पूरे शहर को अपनी चपेट में ले लिया था।

इस हादसे में हजारों लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 48 हजार अति प्रभावित और साढ़े पांच लाख से ज्यादा लोग प्रभावितों की सूची में नामजद हुए।

राज्य सरकार के दस्तावेजों में मृतकों की संख्या 12 हजार और पीडि़त संगठनों के अनुसार 22 हजार से ज्यादा है। इनके लिए कंपनी ने महज 715 करोड़ रुपये का मुआवजा 1989 में केंद्र सरकार से हुए समझौते के बाद दिया था।

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जानकारी के मुताबिक, फरवरी 1989 में यूनियन कार्बाइड और केंद्र सरकार के बीच हुए मुआवजा समझौते का विरोध हुआ।

भोपाल गैस पीडि़त महिला उद्योग संगठन के संयोजक रहे स्व. अब्दुल जब्बार व भोपाल गैस पीडि़त संघर्ष सहयोग समिति के संघर्ष के बाद 3 दिसम्बर 2010 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने सुधार याचिका लगाकर अतिरिक्त मुआवजा 7,844 करोड़ रुपये की मांग की।

सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ को सौंपी गई। जिस पर जनवरी 2020 के बाद सुनवाई नहीं हुई।गैस पीडि़त संगठनों के वकील एनडी जयप्रकाश ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में मामला विचाराधीन है।

सुधार याचिका पर जनवरी 2020 में सुनवाई हुई थी। फिर 11 फरवरी को सुनवाई होनी थी जो अभी तक नहीं हुई है। सरकारों को जल्दी अर्जी लगानी चाहिए। इस मामले में पीडि़त अभी तक न्याय मिलने के इंतजार में हैं।

भोपाल ग्रुप फॉर इनफारर्मेशन एंड एक्शन की सदस्य रचना ढिंगरा का कहना है कि सरकार के पास यह अंतिम मौका है कि सही आंकड़े पेश कर गैस पीडि़तों को मुआवजा दिलवाए।

अगर अब सरकार कुछ नहीं करती है तो गैस पीडि़तों का सालों का संघर्ष बेकार चला जाएगा।

इस मामले में प्रदेश के गैस राहत एवं पुनर्वास मंत्री विश्वास सारंग का कहना है कि गैस पीडि़त महिलाओं की पेंशन चालू करवा रहे हैं। कोर्ट में भी अपना पक्ष रखते आएं हैं। जल्दी सुनवाई की मांग भी करेंगे।

36 साल में भी नष्ट नहीं हो पाया जहरीला कचरा

गौरतलब है कि यूनियन कार्बाइड कारखाने की मालिक कंपनी डाउ केमिकल्स के परिसर में 346 मीट्रिक टन जहरीला कचरा मौजूद है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इंदौर पीथमपुर में 10 मीट्रिक टन कचरे का निपटान किया है। इस निपटान से पर्यावरण पर कितना असर- दुष्प्रभाव पड़ा, इसकी रिपोर्ट का खुलासा होना बाकी है।

इसके लिए दिल्ली से आने वाली उस रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है, जिसमें इस बात का पता चलेगा कि इंदौर के पीथमपुर में नष्ट किए 10 मीट्रिक टन कचरे का पर्यावरण और प्रकृति पर कोई दुष्प्रभाव तो नहीं पड़ा है।

इस रिपोर्ट के आधार पर ही बचे 346 मीट्रिक टन कचरे के निपटान की कार्रवाई तय होनी है। यह निपटान 2015 में हुआ था, इसकी रिपोर्ट केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय को तैयार कर भेजनी है।

दरअसल, मप्र के पास इस जहरीले कचरे के निपटाने के लिए न तो विशेषज्ञ है, न कोई व्यवस्था है।

इस वजह से राज्य सरकार अपने स्तर पर कोई निर्णय नहीं ले पा रही है। यही वजह है कि मामले में सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा है।

इस मामले में गैस राहत एवं पुनर्वास विभाग के संचालक बसंत कुर्रे का कहना है कि इंदौर में 10 मीट्रिक टन कचरे का निपटान किया था।

उसकी रिपोर्ट केंद्र को उसी समय भेज दी गई थी। उसके दिशा-निर्देशों का इंतजार कर रहे हैं। यह उच्च स्तरीय मामला है इसलिए केंद्रीय स्तर से इस पर बहुत सावधानी से अध्ययन किया जा रहा है। केंद्रीय स्तर से ही निपटाने की प्रक्रिया भी तय होनी है।

गैस त्रासदी की 36वीं बरसी पर होगी सर्वधर्म प्रार्थना सभा

इधर, भोपाल गैस त्रासदी की 36वीं बरसी पर एक सर्वधर्म प्रार्थना सभा का सूक्ष्म आयोजन किया जा रहा है।

बरकतउल्ला भवन (सेन्ट्रल लायब्रेरी) भोपाल में गुरुवार, 03 दिसम्बर को सुबह 10.30 बजे से प्रार्थना सभा होगी।

प्रार्थना सभा में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शामिल होंगे। प्रार्थना सभा में दिवंगत गैस पीडि़तों को श्रद्धांजलि अर्पित की जायेगी।

विभिन्न धर्म ग्रंथों का पाठ धर्मगुरूओं द्वारा किया जायेगा। दिवंगतों की स्मृति में दो मिनिट की मौन श्रद्धांजलि भी होगी।

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