Bombay : बॉम्बे हाईकोर्ट की तीन जजों की बेंच ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि मेडिक्लेम पॉलिसी के तहत दी गई राशि को मोटर वाहन अधिनियम के तहत चिकित्सा खर्च के मुआवजे से नहीं काटा जा सकता। इस निर्णय से बीमा कंपनियों पर वित्तीय दबाव बढ़ेगा और यह पीड़ितों के लिए राहत लेकर आया है।
मेडिक्लेम और मोटर वाहन मुआवजा अलग रखने का फैसला
हाईकोर्ट की पूर्ण बेंच ने न्यू इंडिया एश्योरेंस द्वारा दायर याचिका की सुनवाई में कहा कि मेडिक्लेम मुआवजा प्रीमियम भुगतान का प्रतिफल है और इसे मोटर वाहन अधिनियम से जोड़ना अनुचित होगा। बीमा कंपनियों ने इसे “दोहरा मुआवजा” करार दिया, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया।
पिछले फैसलों से हटकर रुख
2013 में हाईकोर्ट ने मेडिक्लेम मुआवजे को मोटर वाहन मुआवजे से काटने की अनुमति दी थी। लेकिन 2006 और 2019 के फैसलों में अलग दृष्टिकोण अपनाया गया। इस बार हाईकोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के 2019 के निर्णय का समर्थन किया, जिसमें बीमा कंपनियों को दोनों बार भुगतान का आदेश दिया गया।
बीमा कंपनियों पर वित्तीय प्रभाव
इस फैसले से बीमा कंपनियों को बड़ा आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह पीड़ितों की मेहनत की कमाई है, जो प्रीमियम भुगतान के रूप में आती है और इसे चिकित्सकीय मुआवजे से अलग रखा जाना चाहिए।
अन्य अदालतों का समर्थन और स्पष्ट निर्देश
कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजा बीमा कंपनियों की अनिवार्य जिम्मेदारी है। बॉम्बे हाईकोर्ट के निर्णय ने इस कानूनी दायित्व को और मजबूत किया है।