मूक-बधिर युवक को ग्रामीणों ने समझा चोर, दुमका पुलिस ने बचाई जान!

इस घटना ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है- बिना किसी ठोस सबूत के किसी निर्दोष को शक के आधार पर बंधक बनाना कितना सही है? अफवाहों पर विश्वास करना और खुद ही सजा सुनाने की प्रवृत्ति समाज में कई बार निर्दोषों के लिए खतरा बन जाती है। पुलिस और प्रशासन बार-बार अपील करते हैं कि किसी भी संदेहजनक व्यक्ति की पहचान या अपराध की पुष्टि के बिना इस तरह की कार्रवाई न करें, लेकिन इसके बावजूद ऐसी घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही हैं।

Smriti Mishra
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Mute and deaf youth mistaken for thief: झारखंड के दुमका जिले के गोपीकांदर थाना क्षेत्र में अफवाहों ने एक निर्दोष युवक को बड़ी मुसीबत में डाल दिया। दुबराजपुर गांव में ग्रामीणों ने बच्चा और मवेशी चोरी के संदेह में एक मूक-बधिर युवक को पकड़ लिया। करीब तीन घंटे तक उसे बंधक बनाकर रखा गया और लगातार पूछताछ की जाती रही। युवक बोलने और सुनने में असमर्थ था, जिस वजह से वह अपनी सफाई नहीं दे सका। मामला बढ़ने से पहले ही पुलिस को इसकी सूचना मिली और मौके पर पहुंचकर युवक को सुरक्षित छुड़ाया गया।

जंगल में घूमता दिखा युवक, अचानक मच गई अफवाह

दुबराजपुर गांव के पास जंगल में जब ग्रामीणों ने एक अज्ञात युवक को घूमते देखा, तो इलाके में अचानक बच्चा और मवेशी चोरी की अफवाह फैल गई। बिना देर किए कुछ लोगों ने उसे पकड़ लिया और ग्राम प्रधान के सामने पेश कर दिया। भीड़ बढ़ती गई, और संदेह के आधार पर युवक से लगातार सवाल-जवाब किए गए। लेकिन मूक-बधिर होने के कारण वह कुछ भी कहने में असमर्थ था, जिससे स्थिति और गंभीर होती चली गई।

पुलिस ने की त्वरित कार्रवाई, युवक को सुरक्षित निकाला

गांव के किसी व्यक्ति ने मामले की सूचना पुलिस को दे दी। जानकारी मिलते ही गोपीकांदर थाना प्रभारी सुमित कुमार भगत टीम के साथ मौके पर पहुंचे। जांच में पता चला कि पकड़ा गया युवक पाकुड़ जिले के महेशपुर प्रखंड के लूटीबाड़ी गांव का रहने वाला मनोज हांसदा है। वह लखन हांसदा का बेटा है और जन्म से ही मूक-बधिर है। पुलिस ने उसे भीड़ से छुड़ाकर थाने लाया और परिवार से संपर्क किया।

परिवार से संपर्क कर सौंपी जिम्मेदारी

युवक की पहचान होने के बाद पुलिस ने उसके बड़े भाई को बुलाया, जिसने पुष्टि की कि युवक मानसिक रूप से भी अस्वस्थ है और अक्सर घर से निकलकर इधर-उधर घूमने लगता है। युवक को परिवार के हवाले कर दिया गया, लेकिन यह घटना कई सवाल छोड़ गई—क्या सिर्फ शक के आधार पर किसी को भी सजा देना उचित है?

बिना पुष्टि के सजा देना कितना सही?

इस घटना ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है- बिना किसी ठोस सबूत के किसी निर्दोष को शक के आधार पर बंधक बनाना कितना सही है? अफवाहों पर विश्वास करना और खुद ही सजा सुनाने की प्रवृत्ति समाज में कई बार निर्दोषों के लिए खतरा बन जाती है। पुलिस और प्रशासन बार-बार अपील करते हैं कि किसी भी संदेहजनक व्यक्ति की पहचान या अपराध की पुष्टि के बिना इस तरह की कार्रवाई न करें, लेकिन इसके बावजूद ऐसी घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही हैं।

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