बस्तर को कॉफी दिलाएगी दुनिया में नई पहचान

News Desk
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रायपुर: छत्तीसगढ़ के बस्तर की पहचान कभी सघन वन के कारण हुआ करती थी, मगर वर्तमान दौर में उसे नक्सल समस्या के कारण जाना जाता है, अब इस नक्सल समस्या के कलंक को मिटाने की कोशिशें तेज हो गई हैं और इसमें बड़ी भूमिका इस इलाके में हो रही कॉफी की खेती निभा सकती है, जो बस्तर को देश और दुनिया में नई पहचान दिलाने वाली होगी।

बस्तर में हो रही कॉफी की खेती की इन दिनों खासी चर्चा है, इसकी वजह भी है क्योंकि बीते दिनों कांग्रेस के सांसद राहुल गांधी का छत्तीसगढ़ प्रवास हुआ।

राहुल गांधी ने यहां लगी प्रदर्शनी में बस्तर कॉफी के स्टॉल पर कॉफी का स्वाद चखा। साथ ही कॉफी को देश और दुनिया की बाजार तक पहुंचाने के लिए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को अंतरराष्ट्रीय कॉफी ब्रांड्स (बड़ी कंपनियों) के साथ बस्तरिया कॉफी का एमओयू करने का सुझाव भी दिया।

गौरतलब है कि बस्तर वह इलाका है जहां के लोगों की जिंदगी पूरी तरह खेती और वनोपज पर निर्भर करती है। खेती में भी धान सबसे ज्यादा उगाई जाती है, मगर अब नवाचार हुआ है।

यहां के दरभा ब्लॉक के दरभा, ककालगुर और डिलमिली गाँव के क्षेत्र अंतर्गत कई सौ एकड़ में कॉफी की खेती की जा रही है। इससे वहां के वनवासी-कृषकों को बड़ा मुनाफा हो रहा है।

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बस्तर के दरभा विकासखंड में कॉफी की खेती की वजह है, यह खेती उन इलाकों में ही हो सकती है जो समुद्र तल से बहुत उंचाई पर हो, दरभा वह इलाका है जो समुद्र से ऊंचाई पर है।

इस अभियान से जुडे लोगों का कहना है कि कॉफी की खेती के लिए तीन चीजें समुद्र से ऊंचाई , फरवरी-मार्च में बारिश और शेड (छाया) जरुरी है। दरभा विकास खंड वह इलाका है जो समुद्र से छह सौ मीटर से लेकर 14 सौ मीटर की उंचाई पर है।

यहां फरवरी-मार्च में बारिश होती है। शेड को तो मानव निर्मित किया जा सकता है, मगर समुद्र से ऊंचाई को मानव निर्मित नहीं कर सकता, बस्तर का यह क्षेत्र उंचाई पर है, जो समुद्र ताल से ऊंचाई की जरूरत को पूरा करता है ।

कुल मिलाकर हालात कॉफी की खेती के अनुरुप है। बस्तर में कॉफी की दो किस्म कॉफी अरबिका और कॉफी रोबस्टा की पैदावार हो रही है।

यहां प्रयोग के तौर पर कॉफी की खेती की गई थी, जो सफल रही और इसे अब किसान भी अपनाने लगे है। कॉफी खेती के साथ कई अन्य उपज भी ली जा सकती है और किसान कॉफी के साथ अन्य फसलें भी उगा रहे है।

बस्तर के कलेक्टर रजत बंसल ने आईएएनएस को बताया है कि, जो आदिवासी पूरी तरह वनोपज और परंपरागत खेती पर निर्भर करते है वे कॉफी की खेती की तरफ आकर्षित हो रहे है।

उनकी आमदनी बढ़ने के साथ जिंदगी में भी बदलाव आ रहा है। राज्य सरकार ने कॉफी की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए कॉफी बोर्ड बनाया है। यहां की कॉफी को देश के कॉफी बोर्ड ने भी उच्च गुणवत्ता पाया हैं।

जानकार बताते है कि कॉफी की खेती से एक साल में प्रति एकड़ में लगभग 30 से 40 हजार रुपए का फायदा हो रहा है, अन्य फसलों से कहीं ज्यादा है।

बस्तर में जलवायु की अनुकूलता को देखते हुए लगभग 3 हजार एकड़ में कॉफी की खेती प्रारंभ की गई हैं। बस्तर काफी की गूंज अब विदेशों में भी हो रही है। वर्तमान में इसका आठ देशों में निर्यात हो रहा है।

राज्य के किसानों की आय बढ़े इस दिशा में कॉफी की खेती बड़ी मददगार हो सकती है, यही कारण है कि आने वाले 60 सालों के लिए कार्ययोजना तैयार की गई है जिससे किसानो को इसका वृहद स्तर पर लाभ मिलेगा।

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