कार्रवाई की हकीकत : ED ने 10 साल में मारे 7300 छापे, सजा सिर्फ 63 को मिली

Central Desk
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ED During Modi Period: PM मोदी के 10 साल के कार्यकाल में एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ED) की गतिविधियों की सच्चाई सामने आई है। जांच एजेंसी ने ताबड़तोड़ छापेमारी की है। बीते दस साल में 7300 लोगों के यहां ED ने तलाशी ली। दस्तावेज खंगाले। इन में से केवल 63 लोगों को ही सजा हो पाई है।

विपक्षी दलों का आरोप है कि ED राजनीतिक विरोधियों को निशाना बना रही है, लेकिन ED और सरकार दोनों का कहना है कि जांच के सिर्फ 3 प्रतिशत मामले ही राजनेताओं से जुड़े हैं।

UPA के कार्यकाल में Money Laundering के एक भी मामले में सजा नहीं हुई, जबकि 2014-24 के दौरान 63 लोगों को सजा सुनाई गई। हालांकि, हो सकता है कि पिछले 10 सालों में मिली सजाएं, दरअसल UPA के कार्यकाल में शुरू की गई जांचों से जुड़ी हों।

UPA के कार्यकाल में जहां 102 चार्जशीट दाखिल की गईं, वहीं एनडीए के 10 सालों में ये संख्या 1281 तक पहुंच गई। यूपीए के समय कुल मामलों के मुकाबले चार्जशीट दाखिल करने का प्रतिशत 6 प्रतिशत से भी कम था, जबकि NDA के तहत ये आंकड़ा करीब 25 प्रतिशत हो गया।

जब ED किसी मामले की जांच पूरी कर लेती है और उन्हें पैसा साफ करने का पहली नज़र में सबूत मिल जाता है, तो वो कोर्ट में चार्जशीट दाखिल करती है।

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इसका मतलब है कि कोर्ट आरोपी के खिलाफ आरोप तय कर सकता है और मुकदमा शुरू हो सकता है।

अब ED के प्रदर्शन की बात करें, तो तलाशी लेने की संख्या 2005-14 के 84 से बढ़कर 2014-24 में 7,300 हो गई और जब्त की गई संपत्ति का मूल्य 5,086 करोड़ रुपये से बढ़कर 1.2 लाख करोड़ रुपये हो गया।

गिरफ्तार किए गए लोगों की संख्या 29 से बढ़कर 755 हो गई। UPA के कार्यकाल में जहां संपत्ति जब्त नहीं की गई थी, वहीं ED ने पिछले दशक में 15,710 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की।

संपत्ति बेचने के बाद अब तक ईडी ने 16,000 करोड़ रुपये से ज्यादा बैंकों और पीड़ितों को लौटा दिए हैं, ये सब हाल के कुछ सालों में ही हुआ है।

मनी लॉन्ड्रिंग कानून के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी के मामलों में 2014 से पहले के 9 वर्षों की तुलना में पिछले 10 साल में 86 गुना बढ़ोतरी हुई है।

वहीं पिछली समान अवधि की तुलना में गिरफ्तारी और संपत्तियों की जब्ती लगभग 25 गुना बढ़ गई है। बता दें कि यह बातें जुलाई 2005 से मार्च 2024 के बीच उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण में सामने आईं हैं। मनी लॉन्ड्रिंग कानून (PMLA) को 2002 में लाया गया था। कर चोरी, काले धन की उत्पत्ति और मनी लॉन्ड्रिंग के गंभीर अपराधों की जांच के लिए एक जुलाई 2005 से इसे लागू किया गया था।

बता दें कि विपक्षी दलों का आरोप है कि पिछले दशक के दौरान ED की कार्रवाई BJP की अगुवाई वाली केंद्र सरकार की अपने प्रतिद्वंद्वियों और अन्य के खिलाफ दमनकारी रणनीति का हिस्सा है।

वहीं, केंद्र सरकार और BJP ने कहा है कि ED स्वतंत्र है, इसकी जांच तथ्यों पर आधारित है और उसे भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त है। PMLA 2002 में बना था, लेकिन इसके असली नियम 2005 में ही आए।

इसलिए, इस कानून के तहत जांच 2005 के बाद ही शुरू हो सकीं, यानी 2004 में UPA सरकार बनने के एक साल बाद। UPA के कार्यकाल में, ED ने PMLA के तहत 1797 जांचें दर्ज कीं।

इस सख्त कानून में, आरोपी पर ही ये साबित करने का बोझ होता है कि वो बेकसूर है। इसकी तुलना में PM मोदी के नेतृत्व वाली NDA सरकार के 10 सालों में, ED ने 5155 मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू की। दोनों वक्त के कार्यकाल की गतिविधियों का फर्क साफ समझ जा सकता है।

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